جمعرات، 13 اگست، 2015

Samir parimal sb ki ghazal

सद्र-ए-मोहतरम की इजाज़त से एक ग़ज़ल पेशे-ख़िदमत है
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उसी क़ातिल का सीने में तेरे ख़ंजर रहा होगा
कि जो छुपकर बहुत एहसास के अंदर रहा होगा
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न जाने किस तरह ख़ामोश दरिया में मची हलचल
निगाहों में तेरी शायद कोई कंकर रहा होगा
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दरो-दीवार से आंसू टपकते हैं लहू बनकर
इसी कमरे में अरमानों का इक बिस्तर रहा होगा
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तुम्हें भी हो गया धोखा ज़मीं की इन दरारों से
समझ बैठे हमेशा ही ये दिल बंजर रहा होगा
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कहीं सिमटा है सन्नाटे की चादर ओढ़कर देखो
कभी बस्ती में वो भी खिलखिलाता घर रहा होगा
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रहूँ ख़ामोश मैं फिर भी फ़साना बन ही जाता है
तेरे दिल में किसी अख़बार का दफ़्तर रहा होगा
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मुझे शोहरत अता की ज़ह्र रुसवाई का पीकर भी
मेरे वालिद के भीतर भी कोई शंकर रहा होगा
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तेरी बुनियाद में शामिल कई मासूम चीखें हैं
इमारत बन रही होगी तो क्या मंज़र रहा होगा
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सुना है आपके दिल में रवां होने लगी नफ़रत
यक़ीनन बदगुमाँ 'परिमल' कोई शायर रहा होगा
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© समीर परिमल

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