جمعرات، 13 اگست، 2015

Narmadeshwar chaudhry Sb ki ghazal

ग़ज़ल
* नर्मदेशवर प्र. चौधरी
चाँद पर बसने की जब तैयारियाँ होने लगीं,
जिन्दगी से रू- ब- रू दुशवारियाँ होने लगीं !

कल किताबों तक सिमट जायेगा खुशबू का वजूद,
चस्पा दीवारों पे अब फुलवारियाँ होने लगीं!

लाश बूढे़ बाप की आँगन से उठ पाई न थी ,
मिल्कियत पर उसकी दावेदारियाँ होने लगीं !

बेरहम तालीम के कसते शिकंजे का असर ,
जल्द होठों से जुदा किलकारियाँ होने लगीं !

अर्थ बच्चों को अहिंसा का बतायें क्या भला ,
मुल्क में हर रोज़ ज़ब बमबारियाँ होने लगीं !

जागती आँखों से देखो खैरियत का ख्वाब अब ,
लूटने वालों की पहरेदारियाँ होने लगीं !

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