ग़ज़ल
* नर्मदेशवर प्र. चौधरी
चाँद पर बसने की जब तैयारियाँ होने लगीं,
जिन्दगी से रू- ब- रू दुशवारियाँ होने लगीं !
कल किताबों तक सिमट जायेगा खुशबू का वजूद,
चस्पा दीवारों पे अब फुलवारियाँ होने लगीं!
लाश बूढे़ बाप की आँगन से उठ पाई न थी ,
मिल्कियत पर उसकी दावेदारियाँ होने लगीं !
बेरहम तालीम के कसते शिकंजे का असर ,
जल्द होठों से जुदा किलकारियाँ होने लगीं !
अर्थ बच्चों को अहिंसा का बतायें क्या भला ,
मुल्क में हर रोज़ ज़ब बमबारियाँ होने लगीं !
जागती आँखों से देखो खैरियत का ख्वाब अब ,
लूटने वालों की पहरेदारियाँ होने लगीं !
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