ग़ज़ल...
अच्छा हुआ गया कि मेरी जाँ पे बार था।
एक बेलगाम दिल जो बहुत बेक़रार था।
अब भी तो हूँ खुशी से मुलव्विस फ़रेब में,
किसने कहा कि मुझको तेरा ऐतबार था।
अब ख़ुद ही मुन्तज़र हूँ कहीं खो गया हूँ मैं,
वो दिन हवा हुए कि तेरा इन्तज़ार था।
मायूसियों की मौजें बहा ले गयीं उसे,
तुझसे जो एक बूँद का उम्मीदवार था।
इलज़ाम मढ़ गया वो मुक़द्दर पे आज फिर,
अपनी तबाहियों का जो ख़ुद ज़िम्मेदार था।
मुख़तसरन अहले-होश! सुनो क़िस्सा-ए-जुनूँ,
ये वो मक़ाम है कि जहाँ पहले दार था।
'ईमान' चल रहे हैं ज़माने के साथ अब,
ख़ातिर में हम ले आए जो कुछ नागवार था।
ایمان گونڈوی
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